बुधवार, 16 मार्च 2011

सजेस्टित होलियाना फायदे


डॉ0 बालेन्दु शेखर तिवारी 
जब गलियों में धवलतम कपड़ों का सहज इस्टमैनकलरीकरण  हो रहा हो और बालकलियों से टपकायमान रंगीन बरसात से मुहल्ले के तमाम हीरो-हीरोइनगण के प्रोग्राम अपसेट हो रहा हो, तो ऐसे नितान्त होलियाना माहौल में कोई साहित्यकार क्या कर सकता है?
आप के मुहल्ले में ‘होली है, होली है’ के धरावाहिक शोर के साथ अनेकानेक रंगों से सराबोर हुरिहारों का समूह गली-गली नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे घूम रहा हो और पानी के अल्पबचत के सरकारी फरमान के प्रति प्रतिबद्ध रंगभीरू मित्रों को बाथरूम से बाहर निकालने के लिए अधिकांश लोग एकमत हों, तो ऐसे विविध् भारती वातावरण में कोई साहित्यकार क्या कर सकता है? 
ऐसे समय के लिए साहित्यकार बन्धूओं और साहित्यकार भाभियों के सेवार्थ कुछ मंगलकारी फायदे से सजेस्टित किए जा रहे हैं। यह सवाल तब और भी सघन हो जाता है जब आप हिन्दी के कवि हों और आपके लिए विधता ने निजी र्ध्मपत्नी के साथ ही साथ चन्द सालियों का प्रावधन भी किया हो अथवा वक्तजरूरत प्रेरणा देने के लिए एकाध् प्रेमिकाएँ भी मुहैया कर दी हों। सच बताइए कि आप कथाकार, कवि, नाटककार, निबंधकार, सम्पादक, पत्रकार वगैरह-वगैरह हैं तो होली के मौसम में आप क्या करते हैं? ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आसपास होली की धूम हो और आप पूरी गम्भीरता के साथ कमरा बंद कर साहित्य रचने बैठे जाएँ। लेकिन इस होलियाना सीजन में जरा बच के। कहीं ऐसा न हो कि आप जिस कलम से रचना लिखने जा रहे हों, वह मूलतः पिचकारी हो और उस पिचकारीनुमा कलम से रंग निकल कर आपको ही मुखमंडल पर चित्राकारी कर दे। कहीं ऐसा न हो कि गर्मी से व्याकुल होकर आप पंखा चलाएँ और पंखे के डैनों से गुलाल की बारिश होने लगे। कहीं ऐसा न हो कि आप लिखने में तन्मय हों, तभी चुपके-से आकर आप की साली या प्रेमिका आकर गुलालचार करने लगे। इस क्षेत्रा में आपके मित्रा भी दगाबाजी कर सकते हैं। यहाँ तक कि अपने बच्चों की श्रीमाता पर भी विश्वास नहीं कर सकते हैं आप। तो सवाल अंगद के चरण की तरह बना हुआ है कि ऐसे घनघोर होलियाना मौसम में कोई साहित्यकार क्या कर सकता है?
तो हे हिन्दी के होनहार साहित्यकारगण! आपके लिए यही संदेश सजेस्टित किया जा सकता है कि फल की चिंता किए बिना कर्म करें। फल तो अपने आप पकेगा। आज से तीन सौ    साल पहले कविगण नयनों की ओट से होली खेलने वाली सन्नारियों का बखान करते थे। इतनी सात्विक होली सब जमाने में लोग खेलते थे कि इस साल की होली में भींगे हुए कपड़े अगले साल तक नहीं सूखते थे। बेचारे कवियों को भी ऐसी मनभावन होली में शामिल होने का चांस मिलता था। दिन भर कवि होली खेलते थे और रत्रि के प्रथम प्ररह में होली के बारे में रसीले छन्द लिखते थे। होली खेलने के लिए अगर वैसी सन्नारियाँ सीन पर हाजिर हो जाएँ, तो आज भी हिन्दी के अधिकांश कथाकार, नाटककार, पत्राकार वगैरह कविता लिखने लगेंगे। लेकिन आज न तो वैसी रसीली होली है और न महारसीली होली खेलने वालियों का वैसा समूह है। इसके बावजूद होली अवश्य है और आप भी हैं, जोकि साहित्यकार हैं। तो सवाल यह है कि होली में क्या कर सकते हैं आप? हर काम में फायदे ही फायदे तलाशने वाला मनुष्य होली में किस फायदे से लाभान्वित होगा? 
जैसा कि अभी निवेदन किया गया, आप बतौर साहित्यकार अपना काम करने के लिए परमफ्री हैं। इस नए साल के प्रारम्भ में आपने गणतंत्रा दिवस पर कुछ न कुछ लिखा ही होगा। फिर वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा पर भी चालू फैशन के अनुसार आपने काव्य रचना की होगी। अब समय आ गया है कि आप होली के बारे में कुछ न कुछ लिखने का कार्यक्रम सम्पन्न करें। न आपको सात सौ सैंतालीस पंक्तियाँ लिखने से कोई रोक सकता है और न होली के मनोवैज्ञानिक/आर्थिक/सामाजिक अध्ययन पर कोई अखबारोचित आलेख लिखने पर कोई बंदिश है। तो यह पहली सलाह आपके लिए सेवा में प्रस्तुत है कि होली पर कुछ न कुछ लिखें अवश्य। फायदे ही फायदे हैं। अर्थ और यश दोनों के चांस उपलब्ध् हैं। 
साहित्यकार को कोशिश करनी चाहिए कि वह जो भोगे, उसे ही जनता के सामने पेश कहे। यह कोई इंसानियत नहीं है कि आप किसी दफ्तर या स्कूल या कॉलेज में करें और शाम में होली के बारे में लिखने लगें। होली पर लिखने के लिए होली में इन्वाल्व होना जरूरी है। इसलिए हे सज्जनों और सज्जनियों, अगर आप साहित्यकार हैं और होली के बारे में कुछ लिखने के लिए आपकी कलम कुलबुला रही है तो कृपया उस पानीपत के मैदान में पहँुच जाइए, जहाँ होली खेलने वालों की सेना सजी है। वहाँ किसी प्राणी को देखकर यह पता लगाना कठिन है कि उन प्राणियों के मुखारविन्द में आँख, कान, नाक, मुँह जैसे तत्त्व कहाँ-कहाँ मौजूद हैं। दूर से ही देख कर ज्ञान हो जाता है कि यह ध्रती वीरों से भरी हुई है। होली के मामले में यह देश विश्वचैम्पियन है और जब तक बना रहेगा, तब तक संसार के अन्य देशों में होली की आदत चालू न हो जाए।  लिहाजा, साहित्यकार को चाहिए कि वह ठीक उसी स्पॉट पर भोगा हुआ यथार्थ प्राप्त करने के लिए पहुँच जाए, जहाँ होली प्रेेमियों का जत्था पूरे उत्साह के साथ शोरकर्म में व्यस्त हो। उस पवित्रा स्थान पर अनुभव की प्रामाणिकता से भीगी हुई रचना अपने-आप प्रकट होगी। 
होली के मौसम में साहित्यकारों के बीच पारस्परिक लातालाती की अपार छूट रहती है। यह एक अतिरिक्त और बोनस किस्म का फायदा प्राप्त होता है कि आप जैसे मन करे वैसे और जिसे मन करे उसे, गालियाँ सादर समर्पित कर सकते हैं। होली के सुअवसर पर इस फायदा-पुराण की कोई सीमा नहीं। आप चाहें तो साहित्यकारों के योग्य कुछ और फायदे भी सजेस्टित कर सकते हैं। 
-6 शिवम, हरिहर सिंह रोड, मोराबादी, राँची-834008    


2 टिप्‍पणियां:

  1. कृपया अपने ब्लॉग की थीम का रंग हल्का कर लें. काली पृष्ठभूमि पर श्वेत शब्द पढ़ने में बाधा पैदा करते हैं.

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  2. होली और साहित्य का सुंदर संयोजन पढने को मिला पोस्ट में..... बहुत बढ़िया

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