रविवार, 26 अप्रैल 2009

अध्यक्ष एवं सदस्यों की क्षुद्रता से कलंकित हुआ झारखण्ड लोकसेवा आयोग


झारखंड राज्य जब 15 नवम्बर, 2000 को पूर्ण अस्तित्व में आया, तब सबसे ज्यादा खुशी यहाँ के युवाओं में थी, उन्हें लगा कि अलग राज्य बनते हीं उनकी मेहनत, सपने सभी पूरे होंगे. उन्हें रोजगार के नये अवसर उपलब्ध होंगे. बाहर के राज्यों में वहाँ के स्थानीय व मूल लोगों से मार नहीं खाने पड़ेंगे. क्योंकि मजबूरी में ये युवा नियोजन की खातिर अपनी मेहनत व किस्मत आजमाने बाहर के राज्यों में जाया करते हैं. झारखंड राज्य में यहाँ के युवाओं के रोजगार के लिए झारखंड लोक सेवा आयोग का गठन हुआ. झारखंड लोक सेवा आयोग योग्य युवाओं को लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार के उपरांत सफल होने पर इनकी नियुक्ति की अनुशंसा विभिन्न पदों पर करती है, परन्तु इस आयोग से काफी आस लगाने वाले मेधावी छात्रों के मंसूबे तब ध्वस्त हो गये, जब आयोग मंे बैठे क्षुद्र पदाधरियों ने आयोग को भ्रष्टाचार का अखाड़ा बना डाला, जहाँ भाई-भतीजा, बहन-बहनोईवाद, वीआईपी और वीवीआईपी के रिश्तेदारों के लिए नियुक्ति का बाजार साबित हुआ. झारखंड लोक सेवा आयोग ने राज्य के लोक सेवकों ;उप समाहर्ता की नियुक्ति में पूरी तरह से भ्रटाचार को आधार बनाया. जेपीएससी के प्रथम एवं द्वितीय सिविल सेवा में आयोग के अध्यक्ष डाॅ0 दिलीप कुमार प्रसाद एवं सदस्यों में डाॅ0 गोपाल प्रसाद सिंह. राधा गोविन्द नागेश; अब सेवानिवृत डाॅ0 शांति देवी ने अपने ज्यादा-से-ज्यादा रिश्तेदारों की नियुक्ति पूरे नियमों को ताक पर रख कर की. प्रथम सिविल सेवा में डाॅ0 दिलीप प्रसाद ने अपनी बहन साधना जयपुरियार की नियुक्ति स्वयं साक्षात्कार लेकर की, वहीं डाॅ0 शांति देवी अपनी बहन कुमारी अलका की भी नियुक्ति प्रथम सिविल सेवा में करवाने में अपनी अहम भूमिका निभाई. द्वितीय सिविल सेवा में डॅा0 दिलीप प्रसाद ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर चचेरे भाई संजय प्रसाद का चयन झारखंड वित्त सेवा में करवाया. द्वितीय सिविल सेवा में वरीय सदस्य डाॅ0 गोपाल प्रसाद सिंह ने उप समाहर्ता के पद पर अपने पुत्र रजनीश कुमार एवं कुंदन कुमार का चयन करवाया. साथ ही अपने भांजी का पति राजेश सिंह ;प्रथम सिविल सेवा संबंधियो में शिवेन्द्र सिंह एवं राहुलजी आनंदजी का चयन डिप्टी कलक्टर के पद पर करवाया. द्वितीय सिविल सेवा में ही सदस्य राधा गोविन्द नागेश ;(अब सेवा निवृत) ने अपनी पुत्री मौसमी नागेश का चयन झारखंड वित्त सेवा में करवाया. वरीय सदस्या शांति देवी ने भी द्वितीय सिविल सेवा में अपनी भतीजी गीतांजलि एवं भाई विनोद राम का चयन डिप्टी कलक्टर के पद पर करवाया. झारखंड लोक सेवा आयोग ने राँची विश्वविद्यालय, विनोवा भावे विश्वविद्याल हजारीबाग एवं सिद्धो कान्हो मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में पदाधिकारियों की नियुक्ति में भी पूरे रूप से अनियमितता एवं भ्रष्टचार का खेल जम कर खेला. उप कुलसचिव एवं सहायक कुलसचिव की नियुक्ति में तो परीक्षाफल के वक्त विज्ञापन ही बदल गया, वह भी आयोग के द्वारा बिना शुद्धिपत्र प्रकाशित किए. अध्यक्ष डाॅ0 दिलीप प्रसाद ने अपने भाई डाॅ0 प्रीतम कुमार का चयन राँची विश्वविद्यालय में उप कुलसचिव के पद पर करवाया, वहीं विज्ञापन के विपरीत डाॅ0 विजय कुमार सिन्हा की नियुक्ति सहायक कुलसचिव के पद पर विनोवा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में करवायी, जबकि विजय कुमार सिन्हा ने राँची विश्वविद्यालय राँची के लिए सहायक कुलसचिव के पद के लिए आवेदन पत्र दिया था. विज्ञापन में विनोवा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग में सहायक कुलसचिव के एक भी पद रिक्त नहीं थे. राँची विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव के एक पद अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित था, परन्तु परीक्षाफल के समय यह पद ही गायब हो गया. अर्थात् यह कि आयोग ने इन अधिकारियों की नियुक्ति में नियमों को ताक पर रख कर अपनी मर्जी को ही कानून मान लिया. आयोग ने विनोवाभावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में उप कुलसचिव एवं सहायक कुल सचिव पदों के लिए भी नियुक्ति की अनुशंसा कर दी, जबकि इन पदों के लिए न तो विश्वविद्यालय द्वारा अध्यिाचना भेजी गयी और न ही आयोग द्वारा जारी विज्ञापन में उन पदों का उल्लेख था. उप कुलसचिव पद के लिए डाॅ0 विजय कुमार सिंह तथा सहायक कुलसचिव के लिए डाॅ0 बहुरा एक्का ने इसका कड़ाई से विरोध किया और अपने कार्यकाल में उन्हें नियुक्ति नहीं होने दी. इस मामले को लेकर उन्होने राज्यपाल के तत्कालीन प्रधान सचिव अमित खरे को भी पत्र लिखा था. इसके बावजूद आयोग पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. यह एक आश्चर्य का विषय है. इसकी ईमानदारी पूर्वक जाँच हो, तो इस भ्रष्टाचार की कड़ी में अमित खरे भी शामिल हैं या नहीं उसका भी खुलासा होगा. इस पर कई बुद्धिजीवी अमित खरे को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं. डाॅ0 बहुरा एक्का के कुलपतित्व काल के समाप्त होने के बाद उप कुलसचिव एवं सहायक कुल सचिव की पदस्थापना कर दी गयी. बहुरा एक्का ने अपने लिखे पत्र में कहा कि विश्वविद्यालय ने पदों के विज्ञापनार्थ आयोग के समक्ष जो अधियाचना की थी, उनमें उप कुलसचिव एवं सहायक कुलसचिव के पद शामिल नहीं थे. दूसरी ओर विजय कुमार सिंह के मूल आवेदन पत्र के अवलोकन से स्पष्ट है कि उन्होंने विज्ञापन के अनुरूप राँची विश्वविद्यालय के लिए आवेदन दिया था न कि विनोवा भावे विश्वविद्यालय के लिए. विजय कुमार सिंह ने तो आवेदन में विज्ञापित पद हेतु किसी भी विश्वविद्यालय के नाम उल्लेख नहीं किया था. किन्तु आश्चर्य इस बात की है कि विजय कुमार सिंह के आवेदन का अग्रसारण सिद्धो कान्हों मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका के कुल सचिव द्वारा 27 नवम्बर, 2004 को हुआ. जहाँ वे काॅलेज के व्याख्याता दर्शाये गये, जबकि इस पद के लिए उन्हें रीडर के पद पर होना चाहिए था. आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 24 नवम्बर नवम्बर, 2004 थी. अनुशंसित छः में से पाँच अनुशंसित आवेदन पत्रों में वांछित राशि के बैंक ड्राफ्रट जमा करने एवं प्राप्ति के प्रमाण उपलब्ध हैं, जबकि विजय कुमार सिंह के बैंक ड्राफ्रट जमा / प्राप्ति का उल्लेख नहीं है. तत्कालीन कुलपति ने अमित खरे को स्पष्ट रूप से लिखा कि उप कुलसचिव तथा सहायक कुल सचिव के पदों पर अपनाई गई प्रक्रिया में काफी विसंगतियाँ हैं. और अनुशंसा के आलोक में विश्वविद्यालय प्रशासन को आदेश पारित करने एवं अधिसूचना जारी करने में संवैधनिक कठिनाई है. विश्वविद्यालय की दृष्टि में इसकी अनुशंसा न्यायोचित व परिनियमानुसार नहीं है. इनकी पदास्थापना करना संवैधनिक सुविधओं के आम अहर्ताधारी नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करना है. वरीय सदस्य डाॅ0 गोपाल प्रसाद सिंह ने अपने भाई शंभू सिंह को उप कुलसचिव के पद के लिए सिद्धो कान्हो मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में आयोग के द्वारा अनुशंसा करवायी. उन्होंने अपने साला उदय कुमार सिंह को वित्त पदाधिकारी पद के लिए भी अनुशंसा करवायी. अपने संबंधी प्रमोद सिंह को सहायक पुस्तकालयाध्क्ष के पद पर सिद्धो-कान्हो विश्वविद्यालय, दुमका, में पदस्थापित किया एवं कुछ माह के उपरांत ही विनोवा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में अंतर्विश्वविद्यालय स्थानांतरण भी करवा दिया. यहाँ पर विनोवा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग ने इस पद के लिए भी आयोग को कोई अधियाचना ही नहीं भेजी थी, फिर भी प्रमोद सिंह का स्थानांतरण आश्चर्य का विषय बना हुआ है, जो यह भ्रष्टाचार की कड़ी का एक दूसरा नायाब नमूना है. झारखंड लोक सेवा आयोग ने प्रथम एवं द्वितीय सिविल सेवा में लिखित परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाएँ अपने परिचितों एवं करीबी व्यक्तियों से जाँच करवायी, वह भी राज्य के अंदर. लाखों रुपये खर्च करने वाले अभ्यर्थियों को कापफी अच्छे अंक प्रदान किए गये. साक्षात्कार में भी पैसे खर्च करने वाले अभ्यर्थियों को 200 अंकांे में से 150 से ऊपर नम्बर दिये गये, जबकि अच्छे अभ्यर्थियों ने काफी अच्छे प्रदर्शन किये फिर भी उन्हें 50 से नीचे अंक दिये गये. आयोग के अध्यक्ष दिलीप प्रसाद, वरीय सदस्य गोपाल प्रसाद सिंह, शान्ति देवी, राधाण् गोविन्द नागेश ;सेवानिवृतद्ध ने अपने रिश्तेदारों को लिखित परीक्षा में हीं इतने ज्यादा अंक दिलवा दिया कि साक्षात्कार में ज् यादा संघर्ष करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. वैसे साक्षात्कार में भी बोर्ड की सहानुभूति इनके साथ थी और अध्यक्ष एवं सदस्यों का प्रभाव तो इन्हें डिप्टी कलक्टर के पद तक पहुँचा ही दिया. इन सारे घपलों-घोटालों और गड़बड़झालों की सच्चाई जानने के लिए सरकार को चाहिए कि सक्षम जाँच समितियों के समक्ष आयोग से सबंधित पदाधिकारियों के रिश्तेदारों की पुनर्परीक्षा ली जाये, तो दुध का दुध और पानी का पानी हो जायेगा. झारखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों ने व्याख्याता नियुक्ति में भी भ्रष्टाचार को आधार बनाया, लाखों रुपये खर्च करने वाले अभ्यर्थियों ने व्याख्याता पद पर आसानी से अपनी जगह बनायी. अध्यक्ष एवं सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों की नियुक्ति में कोई कसर नहीं छोड़ी. और यूजीसी एक्ट की ध्ज्जियाँ उड़ाई गयी. आरक्षण नियमांे को दरकिनार किया गया एवं विकलांगता अध्निियम 1995 की भी उपेक्षा की गयी. अपने चहेतों को एक्सपर्ट बनाकर अपनी मर्जी के अनुरूप अभ्यर्थियो का चयन किया. साक्षात्कार बोर्ड मंे एक ही जाति के लोगों का वर्चस्व बना रहा. कई एक्सपर्ट तो पूरे महीने, पूरे साक्षात्कार तक बने रहे, जबकि यह यूजीसी एक्ट के नियमों के विपरीत है. अध्यक्ष डाॅ0 दिलीप प्रसाद ने समाजशास्त्रा विषय में अपनी साली एवं वनस्पति विज्ञान में अपनी सरहज की नियुक्ति करवायी, तो दूसरी ओर सदस्या शांति देवी ने अपनी बहन कांति कुमारी का चयन इतिहास विषय के व्याख्याता पद पर करवायी. सनद रहे कि अनुसूचित जाति वर्ग को प्रतिनिधित्व करने वाली सदस्या शांति देवी जेपीएससी के लगभग प्रत्येक नियुक्ति में अपने ज्यादा-से-ज्यादा रिश्तेदारों की नियुक्ति करवाने में एक रिकार्ड बना डाला वैसे दिलचस्प बात यह है कि आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की योग्यता भी साक्षात्कार लेने के अनुरूप है ही नहीं. यूजीसी के नियमानुरूप इनकी योग्यता जाँच के दायरे में आती है. 25 फरवरी, 2009 को राज्यपाल के परामर्शी समिति ने प्रथम दृृष्टया वरीय सदस्य डाॅ0 गोपाल प्रसाद सिंह, राध गोविन्द नागेश ;सेवा निवृतद्ध एवं अध्यक्ष डाॅ0 दिलीप कुमार प्रसाद को भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार एवं अनियमितता का दोषी पाते हुए इनके खिलाफ बर्खास्तगी एवं इनके विरूद्ध आपराधिक मुकदमा चलाने की राष्ट्रपति को अनुशंसा की. यह कदम राज्यपाल को इनके खिलाफ लगातार आ रहे शिकायतों, प्रधनमंत्राी कार्यालय, न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय आदि के निर्देशों के आलोक में लेना पड़ा. राज्यपाल की अनुशंसा भी राष्ट्रपति के पास पहुँच चुकी है. व्याख्याता नियुक्ति में सदस्य गोपाल प्रसाद सिंह ने अपने बेटा कुंदन सिंह, बहनोई त्रिपुरारी सिंह , भावज रेखा सिंह, पुत्रावधू जुगनू सिंह, मित्र शैलेन्द्र सिंह, मित्र की पत्नी पियूष बाला मित्र इंदिरा तिवारी, मित्र की पत्नी जूली झा, मित्र का साला रतन झा, मित्र रणविजय यादव, मित्र मनीष दूबे, मित्र नरेंद्र झा. आदि की नियुक्ति करवाने में काफी प्रभावी मूमिका निभाई. राँची से प्रकाशित दैनिक प्रभातखबर ने 18 जून 2008 को एक प्रतिभाशाली पीड़ित छात्र के पत्र को प्रकाशित किया था, जिसमें उस छात्र ने बताया था कि आयोग की सदस्या डाॅ0 शांति देवी ने उसे साक्षात्कार में जर्बदस्ती फेल कर दिया था. बेतुके व अप्रासांगिक सवाल पूछ-पूछ कर उसे प्रताड़ित एवं जलील किया गया और अंततः उसे साक्षात्कार में इतने कम अंक दिए गये कि वह फेल हो गया. उस छात्र का वह साल अंतिम साल था. उम्र का वह पड़ाव भी जिसके बाद वह अभ्यर्थियों की सूची में शामिल नहीं हो सकता था, उसने अपना सर्वस्व लूटने की व्यथा बतायी एवं उसने सरकार एवं समाज से यह सवाल पूछा कि क्यों न वह नक्सली बन जाये? यह सवाल झारखंड के किसी एक छात्र का नहीं, बल्कि लाखों छात्रों का है. इस तरह के छात्रों की कमी नहीं है राज्य में, जिसे जेपीएससी ने प्रताड़ित नहीं किया हो. एक ओर सरकार नक्सल के बढ़ने से चिंतित है. नक्सल उन्मूलन के लिए कई कई सभाएँ एवं सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है, वहीं पर जेपीएससी प्रतिभाशाली छात्रों को मजबूर कर रही है मुख्यधारा से कटने-भटकने के लिए. क्या जेपीएससी के अध्यक्ष एवं सदस्य भ्रष्टाचार, भाई-भतीजा, बहन-बहनोई, साली-सरहज, मित्रा-मित्राणियों की नियुक्ति में मशगूल रह कर झारखंड के युवाओ को दिशाहीन कर मुख्यधरा से काट-भटका देंगे. मजबूरी क्या नही करवाता...ऐसे में यदि युवा सामूहिक रूप से नक्सलियोें की राह पर चल पड़े, तो सरकार का नारा ‘‘आ अब लौट चले’’ का क्या होगा? झारखंड के राज्यपाल द्वारा जेपीएससी के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की सिपफारिश राष्ट्रपति से कर दिये जाने से सब की निगाहें अब राष्ट्रपति भवन की ओर लगी हुई है. ज्ञात हो कि राज्यपाल की सिफारिश पत्र राष्ट्रपति को मिल जाने के बाद राष्ट्रपति भवन की ओर से केन्द्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को कार्रवाई के लिए अनुंशंसा भेज दी गयी है. झारखंड बेट-नेट एशोसिएशन के अध्यक्ष सैयद इरपफानउद्दीन अशर्फी ने राज्यपाल के इस फैसले का स्वागत करते हुए उम्मीद जाहिर की है कि बहुत जल्द पैनल रद्द कर दिये जायेंगे एवं दोषियों को उचित सजा मिलेगी। सैयद इरफानउद्दीन अशपर्फी ने आगे कहा कि आयोग की सदस्या शांति देवी के खिलापफ कोई कार्रवाई नहीं किये जाने से पूरे झारखंड की जनता स्तब्ध हैं.

-सुनील कमल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें